Friday, November 2, 2018

मैं चाहता हूँ तुम्हें देखना

मैं चाहता हूँ
तुम्हें देखना
सर्दियों की एक खिली हुई सुबह.
जब एक हो जाएगी
धूप और तुम्हारे चेहरे की रंगत.
मैं चाहता हूँ
तुम्हें देखना
सोते हुए इत्मिनान से.
बिखरे-उलझे बालों वाली
उस मासूम सी बच्ची की तरह.
मैं चाहता हूँ
बैठना तुम्हारे सिरहाने रातभर
ताकि तुम थाम सको
मेरा हाथ
जब भी आए तुम्हें वो डरावना सपना
जिसमें तुम
भटक जाती हो
अहमदाबाद के सारंगपुर की गलियों में.
पीछे लगे काले दाढ़ी वाले भेड़ियों
से बचने को जब
उठ बैठो पसीने से तरबतर.
आँख खुलते ही
लो ठंडी साँस मुझे पास बैठा देखकर.
मैं चाहता हूँ
तुम्हें गले लगा लेना
जब तुम देखोगी मेरी तरफ़ विश्वास से.
"शुनो ना....
मुझे क्यों लगता है
तुम बैठे हो मेरे सिरहाने
बीस साल से.
तुम जानते थे क्या
मैं सपनों में डरने लगूँगी
इन दोहरे चेहरे वाले लोगों की दुनिया से !!"
मैं चाहता हूँ
तुम्हें देखना
खिलखिलाकर हँसते हुए.
कि तुम्हारी आँखों में
आ जाए वो चमक,
निकल आएँ
पलकों के कोरों से
मोती जैसे दो क़तरे आँसू के.
मैं चाहता हूँ
तुम्हें देखना अलसाते हुए
एक ठंडी सुबह
बिस्तर में सिमटे हुए.
"पियोगी ?"
मैं पूछ लूँ तुमसे
चाय का प्याला थमाते हुए.
और तुम कहो
"हाँ ना...!!"

इश्क़ में बदक़िस्मत

तुम भी
खोल बैठना मन की तहें
बरस जाना
जाते हुए मॉनसून
की ठहरी सी आख़िरी बौछार सी.
मैं तुम्हारी डबडबायी आँखों
से बह निकले काजल को समेट लूँगा.
तुम सुनाना
इश्क़ में डूबे उन
जवान शामों के क़िस्से.
कोरेगाँव पार्क के
क्लब के अंधेरे कोने में
'आउट' होकर
आग़ोश में झूल जाने तक
खायी गयी
नयी दुनिया बसा लेने
जैसी क़समों की फ़ेहरिस्त.
मैं ले चलूँगा तुम्हें अगले दिन
एक ख़ुशनुमा सुबह की सैर पर.
तुम बताना
उस नाकाम प्रेम कहानी
के नायक की बेवफ़ाई
का सबब.
पिंपरी-मुंबई हाइवे पर
लॉंग ड्राइव में
बरसात भरे दिन
हाथ पर हाथ रखकर भी
आई लव यू न बोल पाने का पछतावा.
वट्सएप पर इश्किया इज़हार
के बदले में नीले डंडों
देखने की इंतज़ार
में हुई सुबह का
हैंगओवर.
कह नहीं पाओ तो मत कहना.
मैं तुम्हारे लरजते लबों
से समझ लूँगा दर्द का क़िस्सा.
रीत जाना
सावन की सफ़ेद होती
बदली की तरह.
बरस जाना मुझ पर
निकाल लेना भड़ास
उन रिश्तों के पीछे भागने
की मजबूरी की.
खड़कवासला चलने की ज़िद
करने वालों का
ग़ुस्सा निकाल देना मुझ पर.
नज़र बचाकर सब से
लगा लेना वाइट मिसचीफ़
सिक्स्टी ऐमएल
आख़िरी बार.
फिर हम चलेंगे
खराड़ी में चाय पीने.
मैं चाहता हूँ हटाना तुम्हारे मन से
इश्क़ में बदक़िस्मत होने का बोझ.

रिश्तों पर बर्फ़. !!

वो देखो
उठ रही है भाप
उस छोटे पहाड़ पर जमी बर्फ़ से.
उग रहा है सूरज 
देवदारों के पीछे से.
गुनगुनाती हुई आ रही है
हवा पगडंडी पर फिसलते.
उड़ा लायी है
चीड़ के एक सूखे पत्ते को.
मैं पहचान रहा हूँ इस पत्ते को.
ये वहीं का है
जिसके तने पर उकेरा था
तुमने 'सारा'.
भाग रही है पगली हवा
बिना देखे इधर उधर
पैर उलझाकर गिरेगी
उधर मैदान में.
हाथ से उड़ जाएगा पत्ता
रोएगी पहाड़ की ओर देखकर.
बर्फ़ छँट जाएगी
खिल जाएँगे लेंटाना के हज़ारों फूल.
हवा खिलखिलाएगी.
बर्फ़ से उठी भाप बादल बनकर
छा जाएगी आसमान में.
हवा को उठा लेगी गोद में.
तब बताना तुम मुझे
क्यों जम जाती है
रिश्तों पर बर्फ़. !!

Wednesday, September 5, 2018

मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ

मैं चाहता हूँ
तुम्हें देखना
सर्दियों की एक खिली हुई सुबह.
जब एक हो जाएगी
धूप और तुम्हारे चेहरे की रंगत.

मैं चाहता हूँ
तुम्हें देखना
सोते हुए इत्मिनान से.
बिखरे-उलझे बालों वाली
उस मासूम सी बच्ची की तरह.
मैं चाहता हूँ
बैठना तुम्हारे सिरहाने रातभर
ताकि तुम थाम सको
मेरा हाथ
जब भी आए तुम्हें वो डरावना सपना
जिसमें तुम
भटक जाती हो
अहमदाबाद के सरसपुर की गलियों में.
पीछे लगे काले दाढ़ी वाले भेड़ियों
से बचने को जब
उठ बैठो पसीने से तरबतर.
आँख खुलते ही
लो ठंडी साँस मुझे पास बैठा देखकर.

मैं चाहता हूँ
तुम्हें गले लगा लेना
जब तुम देखोगी मेरी तरफ़ विश्वास से.
"शुनो ना....
मुझे क्यों लगता है
तुम बैठे हो मेरे सिरहाने
बीस साल से.
तुम जानते थे क्या
मैं सपनों में डरने लगूँगी
इन दोहरे चेहरे वाले लोगों की दुनिया से !!"

मैं चाहता हूँ
तुम्हें देखना
खिलखिलाकर हँसते हुए.
कि तुम्हारी आँखों में
आ जाए वो चमक,
निकल आएँ
पलकों के कोरों से
मोती जैसे दो क़तरे आँसू के.

मैं चाहता हूँ
तुम्हें देखना अलसाते हुए
एक ठंडी सुबह
बिस्तर में सिमटे हुए.
"पियोगी ?"
मैं पूछ लूँ तुमसे
चाय का प्याला थमाते हुए.
और तुम कहो
"हाँ ना...!!"

Friday, June 15, 2018

अलविदा मत कहना

बचाए रखना
शब्दों को ख़त्म होने से.
बचा लेना
ख़ुद को भी
शब्द के बेवजह इस्तेमाल से.
शब्द क़ीमती होते हैं
अर्थ निकाल जाए
तो क़ीमत ख़त्म.
बचाए रखना
शब्दों की क़ीमत लगने से.
और ख़ुद को भी
अर्थ होने से.
अर्थ का अनर्थ होने तक
बचाए रखना
उस शब्द को
जिसके बाद खो जाएँगे
मेरे और तुम्हारे
शब्द
अर्थ गर्त
और रिश्ते मिट्टी.
बचाए रखना
ख़ुद को
अलविदा कहने से.

Saturday, June 9, 2018

कत्थई आँखों से उतार देना चश्मा

तुम बोलना मत
बस
देखती रहना
मेरी आँखों में.
पढ़ लेना
वक़्त की मजबूरियों का
हर पन्ना.
देखना अंडरलाइन किए हुए दिन.
मोड़कर रखे
कुछ सफ़हे
जिन्हें मैं पढ़ना चाहता था
बोलकर
तुम्हें सामने बैठाकर
ठीक इसी तरह
खिड़की से पीठ सटाकर.
हाथ में ब्लैक कॉफ़ी का लाल मग
अटकाती रहना
चेहरे पर बार बार
आ जाने वाली लट को
बुंदियों वाले डैंगलर के पीछे.
चलो मैं शुरू करता हूँ
मुड़े सफ़हों को खोलना
बस
देखती रहना मेरी तरफ़.
बोलना मत.
सुनती रहना जब तक सुन सको.
उतार देना
कत्थई आँखों से चश्मा
जब कहने का मन हो
‘कृपा पृष्ठ पलटें....!!’कत्

Tuesday, June 5, 2018

आना समय मिले तो

आ जाना फिर से
समय मिले तो
पहाड़ से नीचे उतरती
कच्ची सड़क वाले मोड़ पर.
बारिश हो तो
ज़िद कर लेना
ख़ुद से
मिलने के लिए
उस इक्कीस जुलाई की तरह
जिसके
लिए तुम लगाती थी
केलेंडर की तारीख़ों पर गोले.
‘प्लीज़ प्लीज़ प्लीज़’
कहकर ज़िद से मना लेने ख़ुद को.
आ जाना
अगर बारिश हो
उस रोज़ की तरह
जब आयी थी तुम
‘बस, पाँच मिनट के लिए’
नज़र बचाकर
वक़्त की भागदौड़ से.
करना वही ज़िद
पहाड़ के मुहाने पर खड़े होकर
दुप्पटे से हम दोनों को ढँकने की.
आ जाना
याद करेंगे
उन काले धागों को
जो तुम ले आती थी
जाने कहाँ से.
तुम्हें लगता था जो
बचा लेगा
दुनियाभर की बुरी नज़रों से
हम दोनों को.
आना भरी बरसात में
ढूँढेगे उस जामुनी रंगे ताबीज़ को भी
जो खो गया था
तुम्हारे हाथ छूटकर.
‘ये अच्छा नहीं हुआ’
तुमने डर कर कहा था.
तुम्हारे वहम पर हँसेंगे
ये बेकार की बातें हैं
मैं फिर दोहरा दूँगा.
आ ज़रूर
मैं दिखाऊँगा तुम्हें
मैंने ढूँढ ली है
उस ताबीज़ खो जाने की जगह.
वहाँ एक पेड़ उग आया है
जामुनी रंग के फूलों का.