Monday, July 30, 2012

करगिल

अबके बसंत


जब कुएं के पास के पीपल की फुनगी पर

चहकेगी चिरैया

इस घर का आंगन हो उठेगा और भी

खुशहाल।

बीते साल

अमराईयों पर पड़ी

बारिश की मार,

बहते खपरैलों के बाद

जब उनींदे से गांव

को घेर लिया था

झिबुआ बाबा की किरोपी ने

बच्चों को छोटी माता ने आ घेरा था,

उस घड़ी तुम

कहीं जूझ रहे थे

दो मोर्चों पर।

गांव से आई चि_ी पर

उभरे हालात और

टेसन की पटडिय़ां

खत्म होने वली पहाड़ी के पीछे। मुल्ला फौज से।

मरघटे के सन्नाटे और

चांदनी रात में

रह-रहकर चित्कारती

टिटहरी के आक्रांत स्वर

सहमा गांव का

कुआं और चौपाल।

अबके बड़े स्कूल

में पढऩे जाती बिटिया ने बताया

परचे में छपा है

वे लौट रहे हैं

ज़र्द चेहरों पर विजयी मुस्कान लिए,

घरों को ।

मुंडेरों से झांकती

गांव की लड़कियां

और चहचहाती

चिरैय्या।

फौजी बूटों की थाप से

उड़ती धूल में

मिलती गौधूलि वेला।

सतरंगी होता आसमान और

बसंती होती चुनरियां।



(करगिल की वर्षगांठ पर उन शहीदों के नाम, जो गांव को नहीं लौटे)

Friday, September 4, 2009

मार्च के आने तक...!!!

तुम्हारे
यूँ सहमकर
देखने से
कुछ पहले ही
मैं समझ गया था/ कि
हवा कुछ बदलाव है.
पुरवाई
रातभर में तो नहीं बनती पछुआ
और न ही
पतझढ़
एक दिन में आता है कभी.
तो क्या
मैं मान लूं
तुम्हारी इस चुप्पी
की सर्दियाँ आहट दे चुकी थी
बहुत पहले से ही .
या यूँ कि
बीते सावन में उस रोज़
सुबकते अमलतास
के तले तरबतर होते जा रहे रिश्तों
के बर्फानी हो जाने का
यकीन हो चला था.
मैं न भी चाहूँ
तो भी
इस हकीकत को तो नहीं
टाल सकूँगा कि
कचनार के झींगुरों वाले फूल
पलों में नहीं मुरझाते.
मार्च के आने तक.

Tuesday, June 23, 2009

कविता का अन्तिम पैरा...



मेरे प्रेम की शुरुआत
मेरी कविता के अंत में नहीं है.
और न ही वह सच है
जो मैंने लिख डाला है
कविताओं में.
अंतहीन, अनंत
हर्फ़ दर हर्फ़
बनते शब्द/
और उनके गूढ़ और जटिल
अर्थों की तरह ही
मेरी संवेदनाएं
और
मेरा प्रेम भी
शायद यूँ ही उलझा हुआ है/ और
रहेगा/ बिना कहे ही
शायद समझ पाओ तो
सही/ या फिर मायूसी
सी सहोगी
सही शब्दों को सुनने के
इंतजार में
ख़त्म होने वाली इस
कविता की तरह.

Monday, May 11, 2009

एक अच्छे आदमी के लिए दो मिनट...

वो अच्छा आदमी था
बेजुबान काम करने वाला.
उसने कभी शिकायत नहीं की
पगार बढ़ने की मांग भी नहीं.
और न ही कुर्सी के पास टेबल फैन लगाने की
वो अच्छा आदमी था.
चिल्लाने वाले मोटे बॉस
की नक़ल भी
कभी नहीं की उसने,
ड्यूटी के बाद भी नहीं.
न कभी डेस्क की गलतियाँ
'प्रूफ़ वालों' पर डालने की परम्परा का विरोध.
'मेरा उससे अधिक वास्ता नहीं रहा, लेकिन प्रोडक्शन वालों ने बताया
वो अच्छा आदमी था.' जीएम ने कहा.
कल ही उसने
मिन्नत की थी पहली बार
'वीकली ऑफ एडजस्ट' करने के लिए,
वोह छुट्टी पा गया, ह
मेशा के लिए.
कृष्ण कुमार अच्छा आदमी था.
दो मिनट का मौन
बहुत है उस जैसे
अच्छे आदमी (कर्मचारी) के लिए.
अब जाइये,
लिखिए, टाईप कीजिये
दुनिया भर के बुरे लोगों की खबरें.
(यह कविता साल 2003 में दुर्घटना में मारे गए दैनिक भास्कर के प्रूफ़ रीडर कृष्ण कुमार के लिए लिखी थी)

Saturday, May 2, 2009

चाँद गुस्से में है...

अब ऐसा क्यों
है कि मुझे
अँधेरी रातें रास नहीं आ रही
पहले की तरह।
झील के उस पार
छोटी सी पहाड़ी के सिरे पर
टिमटिमाने वाले दिए की
रौशनी भी नज़र नहीं
आ रही।
क्यों स्याह आसमान में
आवारा घूम रहा बादल का
यह टुकडा
आज मेरा नाम नहीं पुकार रहा.
क्यों झील के पानी पर
भी आज नहीं थिरक रही चांदनी.
क्यों
उसके हाथों की ठंडी
छुअन मेरी उंगलिओं के पोरों से
होते हुए नहीं पहुँच रही
मुझ तक एक गहरी
ठंडी साँस बनने के लिए
.....और ये चाँद आजकल गुस्से में क्यों है?

बरगद नहीं, पीपल...




वह बरगद नहीं है


जिसकी छाँव में


रह पाते कई जन सुरक्षित


धूप, पानी और तूफानों से।


या जिसकी मजबूत डालों पर


घने पतों के बीच


छिपाछिपी खेलते रहते।


न ही वह इतना फैलाव लिए रहा


ख़ुद में कि


उसके दायरे में


भूखी नज़रों से बचे रहते


चिड़िया के कुछ बच्चे


और बसे रहते अपनी ही दुनिया में।


असल में


उसने कोशिश ही नहीं की


बरगद बनने की


जिसके विस्तार में


जगह पा सकते कई घोंसले।


फ़िर भी उसने


फैलाए रखी अपनी डालें


हर पंछी पखेरू के लिए,


अपनी जड़ों के नजदीक


पंहुंचने दी सूरज की रौशनी


ताकि पल सकें


कुछ और नन्हें पौधे भी।


जुटाई इतनी छाँव भी


जो काफ़ी रही सुस्ताने भर के लिए।


हाँ, यह सिर्फ़ मैं जानता हूँ


इतना करने के बाद भी


पीपल का वह पेड़


बरगद क्यों नहीं बना।
(पिता जी के लिए..)

Thursday, April 30, 2009

आगे धूप है...


अब सुलग रहे हो


झुलसे तन


और छटपटाहट का


क्रंदन करती आत्मा के बीच।


इस तरह के


कठोर धरातल के


सूखकर चटक रहे


संबंधों को


सींचने का


तुम्हारा प्रयास कितना


कामयाब रहा है


तुम


अंदाजा लगा सकते हो।


मैं उसी दिन


तुम्हें कहना चाह रहा था।


जिस दिन तुमने


बढाया था


कदम


इस निर्जन और


कंटीली पत्थरीली राह पर।


उस घर का दरवाजा


बहुत दूर है/ समझाया कि


यहीं रहो इसी आकार में


विश्वास और चाहत की


छाया में।


मैंने कहा था ना


आगे धूप है॥!


"जिंदगी धूप, तुम घना साया"